एक गुमनाम स्वतंत्रता सैनानी: अध्यापक से क्रान्तिकारी बने सोहन लाल पाठक की जीवनी

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सोहन लाल पाठक-एक गुमनाम स्वतंत्रता सैनानी : कौन थे सोहनलाल पाठक ? सोहनलाल पाठक का जीवन परिचय?

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A forget freedom fighter of india – सोहन लाल पाठक  who was sohan lal pathak 

हमारे देश में बहुत सारे क्रन्तिकारी हुए जिनकी वजह से हमारे देश को अंग्रेजों से 200 साल बाद आज़ादी मिली. कई आज़ादी के परवानो को नाम मिला और कई देश भगत गुमनामी में चले गए. ऐसा ही एक नाम है सोहन लाल पाठक जी जिन्होंने अपना जीवन माँ भर्ती की सेवा में निछावर कर दिया. आइये पढ़ें और जाने सोहन लाल पाठक का जीवन (Life of Sohan Lal Pathak) कैसा था और ये क्रांतिकारी कैसे शहीद हुआ. 

नाम  सोहन लाल पाठक
पिता का नाम  पंडित जिंदा राम
जन्म  1873
जन्म स्थान  पट्टी गाँव जिला अमृतसर
शहीद  10 फरवरी, 1916

सोहनलाल पाठक का जीवन परिचय | Sohan Lal Pathak Ka Jivan Parichay and Life History 

अध्यापक से क्रान्तिकारी बने सोहन लाल पाठक – सोहन लाल पाठक (Sohan Lal Pathak) का जन्म 7 जनवरी, 1883 को अमृतसर में हुआ। लाहौर टीचर ट्रेनिंग स्कूल से पढ़ाई करने के बाद अध्यापक के तौर पर पढ़ाने लगे। साल 1901 में शादी हो गई। यही वो दौर था कि पंजाब में क्रान्तिकारी गतिविधियाँ बढ़ने लगी थी, सूफी अम्बा प्रसाद, सैय्यद हैदररजा और स. अजीत सिंह एक तरफ खुल कर मैदान में थे। वहीं लाला लाजपत राय ने भी मोर्चा सम्भाल रखा था।

लाहौर में उनका सम्पर्क लाला लाजपत राय से हुआ पर ये बात स्कूल के हेडमास्टर को पसन्द नही आई। उन्होंने सोहन लाल पर दबाव बनाना शुरू किया, जिसके विरोध में उन्होंने अध्यापक की नौकरी छोड़ दी और लाला जी के साथ खुल कर काम करने लगे। उस समय लालाजी वन्देमातरम् नाम का एक उर्दू समाचार पत्र निकाला करते थे। सोहन पाठक उसमें मदद करने लगे। इधर लाहौर में ही ‘यंग्समैन इण्डिया एसोसिएशन’ की स्थापना लाला हरदयाल ने की थी, सोहन लाल पाठक (Sohan Lal Pathak) का यहाँ उठना बैठना शुरू हुआ।

सोहन लाल पाठक (Sohan Lal Pathak) के अन्दर भारत को स्वतन्त्र करवाने का भाव बड़ी तेजी से बढ़ने लगा। 1909 में सोहनलाल पाठक थाईलैण्ड पहुँचे कुछ दिन वहाँ गुजारने के बाद 13 जनवरी, 1913 को फिलिपींस की राजधानी मनीला पहुँचे। वहाँ कई क्रान्तिकारीयों के साथ अमरीका 18 अप्रैल, 1913 को पहुँचे। यही वो समय था जब विदेश में रह रहे क्रान्तिकारियों ने मिल कर गुदर पार्टी का गठन किया। दुनिया भर के क्रान्तिकारियों ने हाथ मिलाया। लन्दन में श्यामजी कृष्ण वर्मा, भारत में बाघा जतिन, रासबिहारी बोस, अमेरिका में करतार सिंह सराभा, विष्णु पिंगले और अफगानिस्तान पहुँचे मौलवी बरकतुल्लाह भोपाली, राजा महेंद्र प्रताप व मौलवी ओबैदुल्लाह सिन्धी जैसे क्रान्तिकारियों ने कमान सम्भाल ली। ऐसे में सोहन लाल पाठक भला कहाँ पीछे रहने वाले थे; वो भी पूरी तरह सक्रिय हो गए।

इसी बीच कामागाटामारू प्रकरण से उत्पन्न स्थितियों के खिलाफ कनाडा में हुसैन रहीम, बलवन्त सिंह और सोहन लाल पाठक की अगुवाई में एक समिति बनी, जिसने चन्दा एकत्रित करके यात्रियों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने की योजना बनी। सोहन लाल इस समिति के कोषाध्यक्ष थे। असल में क्रान्तिकारियों ने 1914 में शुरू हुए विश्वयुद्ध को भारत को आजाद करवाने के एक मौके के तौर पर देखा; उनका इरादा था कि ब्रिटेन जब युद्ध मे फंस जाएगा तो 1857 की तरह हर भारतीय छावनी में क्रान्ति का बिगुल बजा दिया जाए और देश को आजाद करवा लिया जाए। अलग-अलग नौजवान क्रान्तिकारियों को अलग जगह की जिम्मेदारी दी गई.

बाघा जतिन को बंगाल तो करतार सिंह और रहमत अली को पंजाब भेजा गया। चूँकि सोहन लाल पाठक ने काफी समय बर्मा-थाईलैण्ड के इलाके में गुजारा था, इसलिए उन्हें उस इलाके की जिम्मेदारी दी गई। सितम्बर 1914 को अमेरिका से वो इस मिशन पर निकले; अक्तूबर में जापान पहुँचे वहाँ बाबू हरमन सिंह सहरी से मिले पूरी योजना बनाई। 19 फरवरी, 1915 को ही पूरे भारत में क्रान्ति का झण्डा बुलन्द करना था पर असफलता हाथ लगी।

सोहन पाठक ने हार नहीं मानी, वो रहेंग होते हुए मार्च 1915 में रंगून पहुँचे। यहाँ बड़ी संख्या में भारतीय रहते थे। उन्हें अपने काम को अंजाम देने में बहुत परिश्रम की जरूरत नहीं थी; पर गद्दारों ने अंग्रेजों तक खबर पहुँचा दी और 15 अगस्त, 1915 को सोहन लाल पाठक अपने कई साथियों के साथ गिरफ्तार कर लिए गए। 10 फरवरी, 1916 को बर्मा के माण्डले जेल में बगावत के लिए सिपाहियों को उकसाने के अपराध में सोहनलाल पाठक को फाँसी दे दी गई। इस केस में बाबू हरमन सिंह को भी फाँसी दी गई थी और इनके इलावा बाबू कपूर सिंह मोही और भाई हरजीत सिंह जैसे क्रान्तिकारियों को आजीवन करावास की सजा सुनाई गई।

तो ये थे हमारे देश के गुमनाम एक भारतीय क्रांतिकारी और शहीद सोहन लाल पाठक जो आज़ादी के लिए बर्मा की जेल में शहीद हुए .  

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