Jeevan Mantra: जीवन में नाम स्मरण का महत्त्व

nam simran

जीवन में नाम स्मरण का महत्त्व

– ब्रहमलीन श्री 1008 महामण्डलेश्वर पूर्णानन्द जी (कनखल)

आजकल हमारा जीवन् इतना व्यस्त हो गया है कि हमें भजन ध्यान एवं जप के लिये हमारे पास समय नहीं होता। इसके विपरीत हमें यदि किसी भी कोर्ट, चाहे सेल्सटैक्स अथवा इन्कम टैक्स, दफ्तर आदि में जाना हो तो हम वहाँ पर समय से पूर्व ही पहुँचेंगे, क्योंकि इसमें अपने हित की हानि का भय है इतनी लग्न हमें जप तथा ध्यान में नहीं होती. दूसरे कायौँ की अपेक्षा भजन को महत्त्व कम देते हैं, इसी लिये हमारे पास समय भजन के लिये नहीं मिलता ।

ध्यान अथवा जप का पहला साधन है एकान्त ब्रह्म मुहूर्त में उठकर नित्य क्रिया से निवृत्त होकर, उचित आसन पर अपने सद्गुरु की आज्ञानुसार जप धैर्य एवं निष्ठा से करना चाहिये उसमे किसी भी प्रकार का हेर- फेर नहीं करना चाहिये ।इसमें मन में असन्तोष एवं अश्रद्धा होगी। ध्यान का मुख्य साधन है तीव्र इच्छा एवं दृढ़ संकल्प.  

ध्यान के समय जब मन बाहर के विषयों का चिन्तन करे तब मन का निरीक्षण करके उसे उस दिशा से मोड़कर ध्यान में लगाना चाहिये। ध्यान से इस प्रकार ईश्वर प्राप्ति हो सकती है यथा पूजन नियमित रूप से प्रतिदिन करना चाहिये। इससे मन की शुद्धि होती है।

मन को केन्द्रित करने के लिये मन्त्र अर्थानुसंधान करते हुए झूठे एवं पथ भ्रष्ट करने वाले संकल्पों को तोड़ दें तो निश्चित मन एकाग्र हो जाएगा।

ध्यान निमित्त हृद्रय में ऐसी मूर्ति बनानी चाहिये जो दीर्घकाल तक ज्यों की त्यों बनी रहे। प्रारम्भ में यह कठिन अवश्य है। इसलिये श्री राम जी का मनोहर चित्र पूजन समय पर अपने सामने लगा लेना चाहिए। ध्यान के समय श्री मन्त्र राज का जप अवश्य करना चाहिये। मन्त्र जाप से मन को विक्षेप तथा चंचलता का नाश होता है एवं आनन्द प्राप्त होगा राम नाम वह ठण्डी आग है जो दोषों को जलाती हैं और गुणों में वृद्धि करती हैं। 

जहाँ−कहीं कोई काम न दे, जिसका कोई न हो उसके सखा श्री राम नाम है। वे दीन को उसकी इच्छानुसार मुक्त हस्त से देते हैं। नाम स्मरण सर्वोपरि है। यदि कोई दोष न हो जल्दी फलीभूत होता है।

राम नाम जीवन का आधार है। हमारे अन्तः करण के लिये राम- नाम के अतिरिक्त और कोई साधन नहीं है।

यज्ञ करना अति कठिन है। योग का अभाव है। परन्तु कलिकाल में तो “केवल राम ही नाम अधाराहै। भगवान का श्रद्धापूर्वक नाम लेना चाहिये। भाव- कुभाव, आलस्य अथवा प्रेम से नामस्मरण से द्वादश स्थानों की शुद्धि होती है तथा शारीरिक, समाजिक, अन्य बाधाएं दूर हो जायेंगी.

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