हिन्दू धर्म में पति पत्नी सम्बन्ध

हिन्दू धर्म में पति और पत्नी के अधिकार, कर्तव्य और सम्बन्ध

pati patni sambandh
हिन्दू धर्म में पति पत्नी सम्बन्ध 

पति पत्नी का क्या सम्बन्ध है, पति पत्नी में कौन बड़ा, कौन छोटा है, पति-पत्नी का गृहस्थ में क्या स्थान है, एका का दूसरे पर क्या अधिकार है- इत्यादि विषयों पर बहुत विचार होता रहता है। वस्तुत: इस पर हमारे धर्म में बहुत विचार किया गया है। और उसमें पत्नी का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है ।

अवश्य ही आधुनिक हिन्दू समाज में नारी की बहुत अधोगति हुई है परंतु कुछ अपवादों को छोड़कर मूल को देखा जाये तो जो पति-पत्नी सम्बन्ध सब हिन्दुओं को मान्य है और जिसका वेदों में वर्णन किया गया है, वही जगत में सुख शान्ति स्थिर रख सकता है और सब मनुष्यों को उसी के अनुसार आचरण करना चाहिये।

रूढ़ी कुछ हो, पर इस समय तक भी विवाह सम्बन्ध में पढ़े जाने वाले मन्त्र तो वही आदर्श सामने रखते हैं। विवाह हो जाने के पश्चात् सप्तपदी होती है, जिसमें वर-वधू सात पग इकट्ठे चलते हैं गृहस्थियों को सुखी बनाने के लिये जो कुछ भी चाहिये, सब प्रथम 6 ही मन्त्रों में वर्णित है। सातवाँ पग उठाते समय पति कहता है- ‘ओ सखा सप्तपदि भवः।’ सात पग उठा लिये, अब हम आपस में सखा, मित्र हैं। सखा मित्र से भी अधिक हितचिन्तक होता है।

वेदों में परमेश्वर को भी अपना सखा कहा गया है। विवाह पर जब वर- -वधू बैठते हैं तब कहा जाता है- ‘ओ समजन्तु विश्वेदेवाः समापो हृदयानि नौ’

‘हम दोनों जो आप सब विद्वन्मण्डली के सामने विवाह करने के लिये आये हैं, हमारे हृदय इस प्रकार से मिले हैं जैसे कि दो पानी मिलकर एक स्वरूप हो जाते हैं।’ क्या इन दोनों मन्त्रों से पति पत्नी का स्थान निश्चय नहीं होता। इससे अधिक समानता की बात और क्या कही जा सकती है ।

इतने समानाधिकार के होते हुए भी कुछ कर्तव्य भी तो होने चाहिएं और वैदिक धर्म में विशेषता यही है कि यहां कर्तव्य का अधिकार की अपेक्षा अधिक ध्यान रखा गया है। हमें तो धर्मशास्त्रों के पढ़ने-सुनने से ऐसा प्रतीत हुआ है कि गृहस्थ में पति पत्नी का वहीं स्थान है जो कि राष्ट्र में राजा और मन्त्री का होता है । सब शासन मन्त्री की सम्मति से होता है, परन्तु आशा राजा की ही होती है मन्त्री को पूर्ण अधिकार होते हुए राजा का मान रखना उसका कर्तव्य होता है ।

महर्षि दयानन्द, जिन्होंने स्त्री जाति को पूजनीय बनाया, वे भी अपने संस्कार विधि में लिखते हैं – जब-जब प्रात:, सायं या परदेश से आकर मिलें तब-तब ‘नमस्ते इस वाक्य से नमस्कार कर स्त्री पति के चरण स्पर्श और पादप्रक्षालन, आसन दान करे तथा दोनों परस्पर प्रेम बढ़ाने वाले वचन आदि व्यवहारों से वर्तनकर आनन्द भोगें । ‘

हिन्दू सभ्यता दोनों के समान अधिकार होते हुए पति का कर्तव्य है कि सदा पत्नी को प्रसन्न रखे, उसकी सम्मति से काम करे, उसको घर की सम्राज्ञी समझे। और पत्नी का कर्तव्य है कि पति को सदा प्रसन्न रखे और प्राणपण से उसकी सेवा करे ।

सार यह है कि वेद पति-पत्नी को सखा कहकर समान अधिकार देता हुआ उनका घर में सम्बन्ध राजा और मन्त्री का रखता है। हम इसको ठीक समझ लें तो भारत का बेड़ा पार है।

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